Monday, January 2, 2012

 हिमालय की गोंद में

चाँद सी महबूबा हो, मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था 
हाँ तुम बलकुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था 
चाँद सी महबूबा हो, मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था
 हाँ तुम बलकुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था 

ना कसमे है न रश्मे है, ना सिक्वे है न वादे है..२
एक सूरत भोली भली है, दो नैना सीधे सादे है
दो नैना सीधे सादे है 
ऐसा ही रूप ख्यालों में था , ऐसा मैना सोचा था  
हाँ तुम बलकुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था 
मेरी खुशियाँ ही न बाटे, मेरा गम भी सहना चाहे.....२
देखें ना ख्वाब महलों के, मेरे दिल में रहना चाहे
मेरे दिल में रहना चाहे
इस दुनिया में क्यू था ऐसा, जैसा मैना सोचा था  
चाँद सी महबूबा हो, मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था
हाँ तुम बलकुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था
हाँ तुम बलकुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था

हरीश 

Saturday, December 31, 2011

 ३१ दिसंबर २०११

आज फिर दिल उदास है, ३१ दिसंबर को फिर एक आस है,
जाने वाले  साल ने  क्या कुछ नहीं दिया क्या ये कम ख़ास है,

कैसे बिताये है इस चार दीवारों के बीच में रह कर एक साल हरीश
कैसे भूल सकते है इस जाने वाले साल को जो अपने लिए एक इतिहास है 
दिन तो गुजर जाता है परन्तु साम तन्हाई से भरा हुआ 
इन चार दीवारों के बीच घुटन सी महसूस होती है 
आज फिर दिल उदास है, ३१ दिसंबर को फिर एक आस है
किसी को देखने को मन करे सिर्फ उसे देखता रहूँ 
Happy. Year Ending  


Sunday, December 4, 2011

 आज तक बहुत कुछ खोया है हमने
आज तक बहुत कुछ खोया है हमने ,
लेकिन आज कुछ पाने को दिल चाहता है ,
हर हालात को ख़ुशी से कबूल किया है हमने ,
लेकिन आज उनसे लड़ने को दिल चाहता है,
अब तक तनहा थे जिंदिगी में हम,
लेकिन अब किसी को अपना बनाने को दिल चाहता है ,
ना जाने कब से नहीं सोये है हम,
लेकिन आज जी भर के सोने को दिल चाहता है ,
चलते - चलते बहुत थक गए है हम ,
लेकिन आज एक जगह रुक जाने को दिल चाहता है,
अब तक हर कदम रखा है हमने सम्हाल के ,
लेकिन आज बहक जाने को दिल चाहता है,
हर कोई छोड़ जाता है बीच राह में हमें ,
लेकिन आज सबको तनहा छोड़ जाने को दिल चाहता है ,

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ में ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा ,
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा ,

जीवन का एक ऐसा साथी है,
जो दूर होके पास नहीं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मै
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं

हरीश मासूम विश्वकर्मा

Sunday, November 27, 2011

       
पहले प्यार का पहला गम 
पहली बार हुई आँखे नम
पहला है तन्हाई का ये मौसम 
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम 

हमने थे देखे साथ जो मिलकर सपने रूठ गये
सारे खिलौने कांच के निकले चन से टूट गये 
अब हम है तन्हाई है एक उदासी छाई है 
धड़कन भी है जैसे मध्यम मध्यम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम 

तुम जो नहीं तो दुनिया हमको अच्छी नहीं लगती 
तुम जो नहीं तो बात कोई हो सच्ची नहीं लगती 
हमने दिल को समझाया  
हमने दिल को समझाया 
सब बातों से बहलाया 
लेकिन दिल का दर्द नहीं होता कम 

आ भी जाओ वरना रो देंगे कम 

पहले प्यार का पहला गम
पहली बार हुई आँखें नम
पहला है तन्हाई का ये मौसम 
आ भी जाओ वरना रो देंगे हम 

Harish Chand vishwakarma

Monday, October 24, 2011


तुम्ही से मेरा चाँद खिले 
तुम्ही से चाँदनी मिले 
तुम्ही से सुबह हो मेरी 
तुम्ही से मेरी शाम ढले 
तुम्ही से महके हर कली 
तुम्ही से मेरे फूल खिले 
तुम्ही तो अपने हो मेरे 
तुम्ही से है सब गिले 
तुम्ही तो चाहत हो मेरी 
तुम्ही से मेरा दिल मिले 
तुम्ही से जिंदिगी है  मेरी
तुम्ही से है मेरी ये शिलशिले
जब तुझी से ही मेरी सब कुछ मिले 
फिर क्यूँ ना ....... 
हरिश्चंद्र विश्वकर्मा  

Wednesday, October 5, 2011

नवरात्र 

मैली चादर ओढ़ के कैसे 
द्वार तुम्हारे आऊँ 
हे पवन परमेश्वर मेरे 
मन ही मन शरमाऊँ 
मैली चादर ओढ़ के कैसे ........ 

तुने मुझको जग में भेजा 
निर्मल देकर काया  
आकर इस संसार में मैंने 
इसको दाग लगाया 
जनम जनम की मैली चादर 
कैसे दाग छोढाऊँ
मैली  चादर ओढ़ के कैसे....... 

इन पैरों से चलकर तेरे 
मंदिर कभी ना आया 
जहां जहां हो पूजा तेरी 
कभी ना शीश झुकाया 
हे हरिहर मई  हार के आया 
अब क्या हार चढाऊं
मैली चादर के ओढ़ के कैसे .....

Harishchand Vishwakarma

Sunday, August 21, 2011


जन्माष्टमी के हार्दिक कामनाये
हरे राम हरे कृष्णा 
मेरे तो गिरधर गोपाल ना दुसरा कोई